Skip to main content

Posts

पिता है तो चिंता फिर किस बात की

Recent posts

चिंता नहीं चिंतन ज़रूरी है

अरदास(( श्रद्धांजलि)22/01/2026

कर बद्ध हम कर रहे परमपिता से यह अरदास मिले शांति दिव्य दिवंगत आत्मा को, है प्रार्थना ही हमारा प्रयास कब है बदल जाता है था में, हो ही नहीं पाता विश्वाश माटी मिल गई माटी में , हैं गिनती के सबके श्वास एक सांस भी नहीं मिलता उधार, चाहे लगा लो कितने ही कयास *आया है सो जाएगा* सफर से ही मंजिल बनती है खास जिंदगी एक किराए का घर है  एक दिन करना पड़ता है खाली,गवाह हैं इसके धरा आकाश हमारी शिकायतों हमारी नाराजगी की उम्र हम से लंबी ना हो, इस सत्य का हो सबको आभास *क्षणभंगुर से इस जीवन में हो ही नहीं सकता स्थाई निवास* मिले शांति दिव्य दिवंगत आत्मा को, है प्रार्थना ही हमारा प्रयास *प्रताप जी का प्रताप बना रहा आजीवन* *रहा चित में सदा प्रेम का वास* निज चरणों में दे ईश्वर उन्हें स्थान अब, *पूर्ण हो गए तन के श्वास* मात तात ही होते हैं इस जग में जो अज्ञान के अंधेरे से निकाल दिखाते हैं ज्ञान का प्रकाश मात तात ही हमें अपने से भी आगे  बढ़ते चाहते हैं देखना, करते हैं अपना हर संभव प्रयास कर्म करने की सदा देते हैं प्रेरणा उच्चारण नहीं आचरण का निरंतर करते हैं अभ्यास हमसे हमारा परिचय करवाते हैं मात पिता, हम...

मित्र वही

*मित्र वही जो आशंकित चित को सहज बना दे* *मित्र वही जो जीवन चमन में  हटा कांटे स्नेह सुमन खिला दे* *मित्र वही जो निरस्त नहीं दुरुस्त करने में रखे विश्वास मित्र वही जो महसूस करा दे हो आप उस के लिए अति खास* *मित्र वह जो जज ना करे जलील ना करे,मित्र वही जो सुख दुख में बने एक सुखद अहसास* मित्र वही जो भले ही जाने राज सारे हमारे,पर राज को राज ही रहने दे,कभी किसी के आगे ना खोले बिन कहे ही समझ जाए दिल की बेशक लब हमारे कुछ ना बोलें *मित्र वही जो चित में आनंद का अनहद नाद बजा दे मित्र वही जो बिखरे बिखरे से मन के प्रांगण को हर्षोल्लास से सजा दे* *मित्र वही जो मावास में पूनम का चांद खिला दे  मित्र वही जो आहट मन को राहत  दिला दे* *हर ले चित से हर चित चिंता,चेन की शीतल बयार चला दे मित्र वही जो रेगिस्तान में हरियाली ला दे* *उलझी उलझी सी राहों को बड़ी सरलता से सुलझा दे मित्र वही जो सुख संग दुख भी कर ले साझे,राग द्वेष जड़ से मिटा दे* *संवाद संबोधन रखे सदा मधुर जो, मौन से भी दिल की बात बता दे सलाह मशवरा दे सदा सही वो, हो गांठ कहीं तो सुलह करा दे* *मित्र वह जो स्नेह संग दे सम्मान सदा हो गलती त...

उत्सव हो सबका जीवन

जीवन उत्सव

मकर संक्रांति (( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))