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ललाट

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ज्योति प्रेम की

ज़रूरी तो नहीं

उठो द्रौपदी

औरों से अलग था तेरा प्यार

जाने कहां चले गए हैं माधव

जाने कहां चले गए हैं माधव???? नहीं सुनते अब किसी द्रोपदी की करुण पुकार आखिर कब तक चलता रहेगा ऐसे, न्याय के होंगे कब दीदार??? सुनो द्रौपदी बहुत हुआ अब, अंधा गूंगा बहरा शासन प्रशासन अन्याय मत करो स्वीकार कोमल हो कमजोर नहीं विहंगम सोच को दो आकार गोविंद नहीं आयेंगे द्रौपदी बनो खुद ही शक्ति खुद की होने ना दो दामन दागदार सुरक्षा तो हर बाला का है जन्मजात अधिकार कब तक करेंगे हम इसका इंतजार नाव को डुबो रही देखो  नाव की ही पतवार धिक धिक धिक धिक  धिक धिक्कार  होता है जब असमत का चोला तार तार पूरी मानवता का होता तिरस्कार इतने आंसू बन जाए पारावार अजाब सा बन  जाता है जीवन लगने लगता सब बेकार आया समय अब लगे ऐसी फटकार फिर कोई सोच भी ना पाए हो ना कभी किसी का बलात्कार जब तक सोच में नहीं होगा सुधार पुनरावृत्ति होती रहेगी बार बार

मां जैसा कोई रंगरेज नहीं