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प्रथम पूजनीय

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राम अंश

राम बसे हैं सबके उर में

मां ऐसी ही होती है

कितनी नादानियों को हमारी,माँ अपने दिल में सहजता से समा लेती है,कितनी भूलों को हमारी,माँ क्षमा का तिलक लगा देती है,कितने अपशब्दों को हमारे,माँ यूँ ही भुला देती है,हमारी इच्छाओं की पूर्ति हेतु,माँ अपनी ख्वाशिओं को बलि चढ़ा देती है,हमारे उज्जवल भविष्य हेतु,माँ अपना वर्तमान कर्म की वेदी पर चढ़ा देती है,माँ हमे क्या क्या देती है,क्या क्या करती है,शायद हम ये समझ भी नही पाते,पर हम माँ जो क्या देते हैं,ये विचार भी जेहन में लाने से हैं कतराते,कड़वा है,पर सच है

हिंदी दिवस पर आओ संकल्प को सिद्धि से मिलाते हैं

कलेंडर को एक तिथि नहीं है 14 सितम्बर

हिंदी से ही चमक रहा है हमारा हिंदुस्तान