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भावों से होता है अनमोल उपहार

मां कंठ हम आवाज

मां से बेहतर मां से मीठा होता ही नहीं कोई साज़ यूं हीं तो नहीं कहा गया मां कंठ हम आवाज

पूरा जहां

ओ नर्मदा

ओ नर्मदा क्यों बनी नहीं नर्म तूं क्यों इतने जीवन लील लिए क्रूज बना क्यों इतना क्रूर क्यों घाव सदा के लिए दिए

रौनक ए अंजुमन

पंचशील