धरा पर रह कर छूना आता था तुझे आकाश सपने बड़े देखे और प्रयास किए शिद्दत से,संकल्प खुद ही चल कर आ गया सिद्धि के पास चुनौती को अवसर बनाने में महारथ हासिल थी दोनों को ही, आलस्य कभी नहीं आया दोनों को रास पापा भी कैसे भरी दोपहरी में गेहूं लेने गांव गांव जाते थे आमदनी बढ़ाओ खर्चे ज़रूरी हैं जो वे करो,अक्सर हमें समझाते थे 9 जनों की भरी पूरी गृहस्थी बड़े प्रेम से चलाते थे ताशों की बाजी जीत जाने पर कितना खुल कर मुस्कुराते थे सीखने को बहुत है उनकेे जीवन से, बिन पा के मां कैसे कर पाती हम सब का विकास करबद्ध हम कर रहे परमपिता से यह अरदास मिले शांति दोनों ही दिव्य आत्माओं को,है प्रार्थना ही हमारा प्रयास परिस्थिति को कभी मनःस्थिति पर हावी ना होने दिया मां जाई ने, धरा पर रह छू लिया आकाश वह है नहीं,नहीं होता यकीन,विश्वाश को भी नहीं आता विश्वाश एक हूक सी उठती है सीने में, कितना सुखद होता था उसके होने का आभास *हानि धरा की लाभ गगन का* यही उसके बिछौडे का है सार बखूबी जानती भी थी मानती भी थी प्रेम ही हर नाते का आधार उम्र छोटी पर कर्म बड़े सपनों को दे गई आकार कुछ लोग जग से भले ही चले जाएं पर जेहन से जाते नहीं...