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लम्हा लम्हा बीती ज़िंदगानी

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बनी रहे जोड़ी

मेरी प्यारी बहना अंजु

मेरी प्यारी बहना अंजु… मेरी प्यारी बहना अंजु!  तू थी सबसे न्यारी, भगवान ने बहन बनाकर भेजा,  पर लगी तू सदा ही बेटी प्यारी तेरी सूरत, तेरी बातें,  दिल में घर कर जाती थीं, मेरी बेटी में भी तेरी ही  झलक नज़र मुझे आती थी तू थी जैसे कुदरत का  एक अनमोल सा तोहफ़ा, तेरे बिना ये जीवन लगे अधूरा, जैसे सूना सा कोई रस्ता। हम सबकी वो छोटी गुड़िया,  सबकी बड़ी दुलारी थी, देखते-देखते कब तू दो बेटियों की माँ बन गई,  ये भी एक कहानी थी यूं हीं तो नहीं ये भीड़ तेरी इतनी मां जाई दीवानी थी सुहानी-पावनी में तेरा ही चेहरा मुस्काता है, कुछ भी करूँ उनके लिए, मन तुझ तक ही जाता है। तूने हर रिश्ता ऐसे निभाया, जैसे कोई फर्ज़ नहीं—इबादत हो, बेटी, बहन, माँ, पत्नी… हर रूप में तेरी मोहब्बत हो। नीलेश की दुनिया थी तू, उसकी हर खुशी का राज, तेरे बिना उसका दर्द कह पाना, जैसे टूटे हर एक साज़। हम दुआ करते हैं अब बस, तेरी बेटियाँ मुस्कुराती रहें, अपने पापा के संग जीवन में हर खुशी पाती रहें। मेरी अपनी राहों में भी, तू ही मेरा सहारा थी, हर मुश्किल में लगता था—“अंजु है”, तो उजियारा था। आ...

मैने बोला मुख से राम

यूं हीं नहीं लिखी जाती किताब(( श्रद्धांजलि स्नेह प्रेमचंद द्वारा)

कोई जुगुनू नहीं,कोई दीपक नहीं निश्चित ही वह रही होगी *आफताब* यूं हीं तो नहीं लिखी जाती किताब कुछ नहीं,बहुत कुछ खास था उसमें कभी झूठ का नहीं ओढ़ा *नकाब* कितना भी कठिन हो कोई प्रश्न हौले से दे दिया करती *जवाब* *रौनक ए अंजुमन* का सही होगा उसे देना *खिताब* *चितचोर* कहना भी होगा सही उसे,एक अलग ही था उसका *रुआब* कोई इसके जैसा होगा नहीं कभी कोई दूजा,  पूरा लगा कर देख लिया *हिसाब* *उड़ान गगन सी था धरा सा धीरज* नहीं देखा उसे कभी *बेताब* आज भी सोचती हूं  जब उसके बारे में आंखों में आ जाता है*सैलाब* फूलों में से देना हो कोई नाम तो कहूंगी उसको खिला *गुलाब* छोटे से जीवन में जी गई जीवन बड़ा सा,कभी पसंद नहीं थे उसे शराब,शबाब और कबाब भगति धारा बहती थी चित में बड़े वेग से,ऐसी रही उसके जीवन की *किताब* हमारे परिवार का तो एक हीरा थी *नायाब* एक शब्द में करना हो परिभाषित उसे  होगा वह *लाजवाब* जाने इतना प्रेम कहां से लाई  प्रेम सुता सबसे ही करती थी *बेहिसाब* शीतल इतनी जैसे *माहताब*( चांद) धन्य हो गई मेरी लेखनी जो चली तुझ पर ओ*आफताब* मेरा लिखना सार्थक हो आया हो गई जैसे लेखन में *कामयाब* *हानि ...

कभी नहीं बदली

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