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दुर्गम पथ के ओ बटोही

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पगडंडी से हाई वे तक

सावन आने पर क्यों बुआ का मन बेटी सा हो जाता है

सावन आने पर जाने क्यों बुआ का मन बेटी सा हो जाता है *दिल तो बच्चा है जी* यदा कदा अतीत के गलियारों में जाना उसे भाता है बुआ कभी तो बेटी थी उस आंगन की, भले ही समय संग दौर बदल जाता है आज भी बुआ को अपने भाई भतीजों में मात तात का अक्स नजर आता है स्नेह डोर से जुड़ और भी गहरा हो जाता उसका नाता है वह कुछ लेने नहीं आती पीहर उसका दिल तो अपनों को देख ही खुश हो जाता है सावन आने पर बुआ का दिल सच बेटी सा हो जाता है उस आंगन की माटी की सौंधी सौंधी महक से अंतर्मन उसका पूरे का पूरा  महक जाता है याद आती है उसे अपनी वह गुड़िया अपनी अलमारी अपनी सखी सहेलियाँ,अवरुद्ध सा कंठ रूंधा रुंधा हो जाता है खो जाती है बुआ अतीत के गलियारों में,उसे भतीजी में अपना अक्स नजर आता है याद आते हैं उसे वे मां बाबुल,कतरा आंसू का,कोना आंखों का गीला कर जाता है याद आता है बुआ को वह प्यारा सा बचपन,जहां अधिकार बड़े रौब से मुस्कुराते थे छोटी सी बात पर रूठ जाती थी बुआ, मात पिता उनके कितनी बार मनाते थे जब जब भी आता है सावन, बुआ का दिल बेटी सा हो जाता है आते हैं जब भात कोथली स्नेह परवाह से हाथ मिलाता है कोयल की पीहू पीहू   ए...

ढाल से मात पिता

वह गीता बन कर दिखा गई

मां की पुण्यतिथि पर शत शत नमन

उत्सव नहीं महोत्सव