कर्म का मर्म समझा दे, कि आलस ना कभी आए दिशा ऐसी दिखा दे तू कि भटकन पास ना आए मैं गाऊं गीत गीता के मुझे कुछ और ना भाए ये गीता रूप है तेरा मुझे इतना समझ आए मैं जब भी दिल से पढ़ती हूं नजर मोहन मुझे आए सुना दे तान बंसी की ये मन राधा सा हो जाए गुणों को सोख लूँ माधव शमन विकारों का हो जाए करूँ ना चित कभी आहत कि मन मोम हो जाए